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Reservation in Promotion and Dalveer Bhandari

प्रोमोसन में आरक्षण और दलवीर भंडारी का चरित्र चित्रण 

(विशेष : मैं किसी को ऊँची या नीची जाति नहीं मनता हूँ) 

प्रोमोसन में आरक्षण राजनीति में नई भूचाल ला दिया है| लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है| न्यापालिका के प्रति सम्मान के साथ न सिर्फ यह कहा जा सकता है, कि न्यायाधीस बेईमान हो सकते हैं, बल्कि हैं| इस फैसले को जिन दो जजो ने दिया है, उनका सम्बन्ध (तथाकथित) ऊँची जातियों से है|


(तथाकथित) ऊँची जाति के न जाने कितने ही लोगो ने सामजिक न्याय की लड़ाई लड़ा है| हम उनका सम्मान और क़द्र करते हैं| लेकिन जिस दलवीर भंडारी के पीठ ने यह फैसला दिया वे सामाजिक न्याय खासकर आरक्षण के खिलाफ फैसला देने के लिए जाने जाते हैं| अशोका vs भारत सरकार (Writ Petition (civil) 265 of 2006, judgement came on March 29, 2007) जो OBC को शिक्षा में आरक्षण देने सम्बन्धी था के सात बेंच के पीठ में आरक्षण के खिलाफ नोट लिखने वालो में दलवीर भंडारी भी थे| बाकि दो जजों ने आरक्षण से अपनी सहमती दिखाई थी लेकिन उसने क्रियान्वयन पर उनका मत अलग था| लेकिन ये दलवीर भंडारी ही थे जिन्होंने अपना नोट इस तरह से लिखा कि आरक्षण के मायने ही ख़तम हो गए थे| इन्होने कई और भी मामलों में भी आरक्षण के खिलाफ अपने फैसले दिए हैं| 

OBC को शिक्षा में आरक्षण दिलाने के लिए हमलोगों को पुनः दिल्ली उच्च न्यायलय (Writ Petition No. 4857/2010, orders on 7-9-2010और सर्वोच व्ययालय में इन्द्रसेन के याचिका (P.V.Indiresan, a non-party, Civil Appeal No. 7084 of 2011) पर हमलोगों को को पार्टी बन कर जाना पड़ा था| ये दलवीर भंडारी ही थे जिनके वजह से हमलोगों को पुनः सर्वोच व्ययालय  जाना पड़ा और OBC के लिए उच्च शिक्षा में आरक्षण 2011 में मिल सका, जबकि यह कानून संसद ने 2006 में ही पास कर दिया था| दलवीर भंडारी के नोट के अधर पर ही इन्द्रसेन और 'यूथ फॉर इक्वालिटी (YFE)' आदि ने सर्वोच न्यायलय  में पुनः याचिका दायर किया था| 


यह भी याद दिलाना प्रासंगिक होगा कि YFE ने दलवीर के ही नोट को आधार मानकर 2010 में JNU को अपने वकील से एक नोटिश भेजवाया था| वह कोई क़ानूनी नोटिश भी नहीं था लेकिन JNU के ब्रह्मंवादियो से सांठ-गाँठ कर के JNU प्रवेश परीक्षा का तैयार परिणाम को बदल दिया था जिससे कारन लगभग 400 विद्यार्थी JNU में पड़ने से वंचित हो गए थे| 

इतना ही नहीं जब हमलोग JNU और DU में आरक्षण पूरा करने के लिए सर्वोच न्यायलय गए थे तो वरिष्ठ वकील लाहोटी और के० के० वेणुगोपाल, आदि ने देश के इतिहास में पहली बार यह मांग रखी थी कि इसकी सुनवाई रविन्द्रन के अदालत में न कर के दलवीर भंडारी के अदालत में किया जाये, या दलवीर भंडारी इस बेंच के सदस्य हों| अर्थात आरक्षण विरोधी संगठनो ने सारी बेशर्मी तक पर रख कर, मनपसंद जज की मांग की गई थी| 

वकील और जज में सेटिंग - गेटिंग कोई नई बात नहीं है लेकिन देश के इतिहास में यह पहली बार खुले रूप में देखने को मिला| इसपर जब हमारे वकील ने यह कहा था कि अगर दलवीर भंडारी अवकाश प्रापर कर जाते या मृत्य को प्राप्त कर जाते तो, तो आप उन्हें कैसे बुलाते? रविन्द्रन ने इसे मुख्य न्यायाधीस को रेफर भी कर दिया था, लेकिन अंतत मुख्य न्यायाधीस ने लाहोटी अदि के इसा दलील को नहीं माना| 

दलवीर भंडारी के इन्ही कारजुरारियों के बजह देश के इतिहास में पहली बार किसी सिटिंग जज को UPA सरकार ने International Court का भारतीय कोटा से न्यायाधीस बनाया| यह सिर्फ भारत में पहला मामला नही है अल्कि दुसरे देश भी किसी सिटिंग जज को  International Court का न्यायाधीस नहीं बनाते हैं| 


इन सब बातो से इस बात को बल मिलाता है कि न्यायपालिका में अविलम्ब सभी समुदायों को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाये| 
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